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मुझे इस तरह, वो भुला रही थी अलगनी में कपड़े सुखा रही थी •••

मुझे इस तरह, वो भुला रही थी

अलगनी में कपड़े सुखा रही थी


भरी दोपहरी का वो वाक़्या था

जिद्द पर खुद को जला रही थी


हाथों की लकीरें खुरच रही थी

वो नसीब अपना मिटा रही थी


चुप चुप सी बैठी,तन्हाईयों को

वो कहानी अपनी,सुना रही थी


याद करके भूल रही है मुझको

भूल भूल कर याद आ रही थी


वक्त अपने मोहरे बिछा रहा था

जिंदगीअपने रंग दिखा रही थी


लाचारगी ये दिल दुखा रही थी

मजबूरियाँअपनी सता रही थी

(विनोद प्रसाद)

 
 
 

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